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न वाऽउ॑ऽए॒तन्म्रि॑यसे॒ न रि॑ष्यसि दे॒वाँ२ऽइदे॑षि प॒थिभिः॑ सु॒गेभिः॑। यत्रास॑ते सु॒कृतो॒ यत्र॒ ते य॒युस्तत्र॑ त्वा दे॒वः स॑वि॒ता द॑धातु ॥१६ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

न। वै। ऊँ॒ऽइत्यूँ॑। ए॒तत्। म्रि॒यसे॒। न। रि॒ष्य॒सि॒। दे॒वान्। इत्। ए॒षि॒। प॒थिभि॒रिति॒ प॒थिऽभिः॑। सु॒गेभि॒रिति॑ सु॒ऽगेभिः॑। यत्र॑। आस॑ते। सु॒कृत॒ इति॑ सु॒ऽकृतः॑। यत्र॑। ते। य॒युः। तत्र॑। त्वा॒। दे॒वः। स॒वि॒ता। द॒धा॒तु॒ ॥१६ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:23» मन्त्र:16


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब मनुष्य कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्यार्थी ! (यत्र) जहाँ (ते) वे (सुकृतः) धर्मात्मा योगी विद्वान् (आसते) बैठते और सुख को (ययुः) प्राप्त होते हैं वा (यत्र) जहाँ (सुगेभिः) सुख से जाने योग्य (पथिभिः) मार्गों से तू (देवान्) दिव्य अच्छे-अच्छे गुण वा विद्वानों को (एषि) प्राप्त होता है और जहाँ (एतत्) यह पूर्वोक्त सब वृत्तान्त (उ) तो वर्त्तमान है और स्थिर हुआ तू (न) नहीं (म्रियसे) नष्ट हो (न, वै) नहीं (रिष्यसि) दूसरे का नाश करे (तत्र) वहाँ (इत्) ही (त्वा) तुझे (सविता) समस्त जगत् का उत्पन्न करनेवाला परमेश्वर (देवः) जोकि आप प्रकाशमान है, वह (दधातु) स्थापन करे ॥१६ ॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य अपने-अपने रूप को जानें तो अविनाशीभाव को जान सकें, जो धर्मयुक्त मार्ग से चलें तो अच्छे कर्म करनेहारों के आनन्द को पावें, जो परमात्मा की सेवा करें तो जीवों को सत्यमार्ग में स्थापन करें ॥१६ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ मनुष्याः कीदृशा भवेयुरित्याह ॥

अन्वय:

(न) निषेधे (वै) निश्चयेन (उ) वितर्के (एतत्) (म्रियसे) (न) (रिष्यसि) हिन्धि (देवान्) दिव्यान् गुणान् विदुषो वा (इत्) एव (एषि) प्राप्नोषि (पथिभिः) मार्गैः (सुगेभिः) सुखेन गन्तुं योग्यैः (यत्र) (आसते) उपविशन्ति (सुकृतः) धर्मात्मानः (यत्र) (ते) योगिनो विद्वांसः (ययुः) यान्ति (तत्र) (त्वा) त्वाम् (देवः) स्वप्रकाशः (सविता) सकलजगदुत्पादकः परमेश्वरः (दधातु) धरतु ॥१६ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्यार्थिन् ! यत्र ते सृकृत आसते सुखं ययुर्यत्र सुगेभिः पथिभिस्त्वं देवानेषि यत्रैतदु वर्त्तते स्थितस्त्वं न म्रियसे न वै रिष्यसि तत्रेत्त्वा सविता देवो दधातु ॥१६ ॥
भावार्थभाषाः - यदि मनुष्याः स्वस्वरूपं जानीयुस्तर्हि तेऽविनाशित्वं विद्युः। यदि धर्म्येण मार्गेण गच्छेयुस्तर्हि सुकृतामानन्दं प्राप्नुयुः। यदि परमात्मानं सेवेरँस्तर्हि सत्ये मार्गे जीवान् दध्युः ॥१६ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी माणसे आपले स्वरूप जाणतात ती अविनाशी तत्त्व जाणू शकतात. जी धर्मयुक्त मार्गाने चालतात, ती सत्कर्म करण्याचा आनंद मिळवू शकतात. जी माणसे परमेश्वराची सेवा करतात. जी जीवांना सत्य मार्गाने नेऊ शकतात.